रविवार, 7 मई 2017

मिशन 2019: योगी से ही आस,योगी पर विश्वास

"सीएम #योगी के शुरुआती तेवरों से लग रहा था कि वो यूपी की भ्रष्ट और लापरवाह नौकरशाही को बदल कर रख देंगे, लेकिन अब साफ दिख रहा है कि इन नौकरशाहों के नापाक गैंग ने उनको बदल कर रख दिया है"
हज़रतगंज थाने का औचक निरीक्षण, गोमती रिवर साइड पर ऑन स्पॉट सवाल-जवाब। ये जनता को रास आ रहा था। असल में जनता जो कि सारी राजनीतिक व्यवस्था की मालिक है, भ्रष्ट नौकरशाही उसको गुलामों की तरह ट्रीट करती है। जनता की इस नौकरशाही से जातीय खुन्नस है। जब ये नौकरशाही किसी के सामने गिड़गिडाउ मुद्रा में दिखती है, तो इस व्यवस्था के असल मालिक अर्थात जनता को बड़ा सुकून मिलता है। अगर ये सुकून देने का काम उसका चुना हुआ प्रदेश का मुखिया करता है, तो जनता की अपार मेहरबानियाँ उसी पर बरसती हैं।
शुरुआत में #मायावती ने भी जनता और नौकरशाहों के बीच स्थापित इसी मनो भड़ास का पूरा फायदा उठाया था, तभी तो वो औचक निरीक्षण में सार्वजानिक रूप से अधिकारी से कहती थी, कि ऊपर मुंह क्या देखता है, नीचे नाली देख कितनी गन्दी है? मायावती नें अपने ये तेवर एक दो महीने नहीं बल्कि सालों तक बरकरार रखे थे। एक समय नौकरशाही उनके नाम से काँपती थी। वो अलग बात है कि कालान्तर में वो खुद भी इसी भ्रष्ट नौकरशाही की कठपुतली बन गयी थी।
असल में यह नौकरशाही आज भी अंगरेजी मानसिकता के कीटाणुओं,जीवाणुओं और विषाणुओं से युक्त है। ये ईमानदार को ईमानदार और बेईमानों को बेईमान नहीं रहने देना चाहती है। ऐसा नहीं है कि मैं सुशील अवस्थी राजन योगी विरोधी हूँ। बल्कि मुझे इसी योगी में यह आशा की किरण दिख रही है कि वह असल मालिक यानी जनता को उसका मालिकाना हक़ दिला सकता है, और नौकर को नौकर बना सकता है। मेरी यह आशा जब मरती हुई दिखती हैं तो तकलीफ होती है। मिशन 2019 साधने के लिए योगी को वही करना होगा, जो मैं यानी जनता चाहती है।

बांग्लादेशी सेक्सवर्कर ने मांगी मोदी से मदद


बांग्लादेश की एक गार्मेंट फ़ैक्ट्री में नौ हज़ार रूपए के मासिक वेतन पर काम करने वाली तलाक़शुदा महिला आयशा (बदला हुआ नाम) को उनके ही एक सहकर्मी ने भारत में अच्छी नौकरी का लालच दिया था.
उस व्यक्ति पर भरोसा कर, बिना माँ-बाप को बताए, दलाल के माध्यम से वो मुंबई पहुँचीं, मगर वहाँ उनके ही सहकर्मी ने मात्र 50 हज़ार रूपए में उन्हें एक नेपाली औरत को बेच दिया, जो एक वेश्यालय चलाती थी.
फिर आयशा को जबरन देह-व्यापार करना पड़ा, और मुंबई से बेंगलुरु तक अलग-अलग शहरों में देह-व्यापार के अड्डों से होती हुई, अलग-अलग लोगों के चंगुलों में फँसने के बाद, अंततः उनका ठिकाना बना पुणे का रेड लाइट इलाक़ा.
वहीं से कुछ दिनों पहले पुणे शहर की पुलिस ने उन्हें छुड़ाया और एक ग़ैर-सरकारी संस्था के सुपुर्द कर दिया. इस संस्था के लोगों ने ही मुंबई में बांग्लादेशी उच्चायोग से जुड़े दफ़्तर के साथ संपर्क किया और आयशा के घरवालों का नाम-ठिकाना बताया.
जल्दी जाँच-पड़ताल पूरी हुई और आयशा को उनके देश वापस भेजने की व्यवस्था और तैयारी की गई. अगर सब कुछ ठीक रहा तो वो 15 मई को बांग्लादेश लौट भी जाएँगी.
आयशा की अभी तक की कहानी अभी तक बांग्लादेश की दूसरी हज़ारों असहाय नारियों की तरह ही लगती है - जो अच्छे काम की तलाश में भारत आती हैं और एक अंधेरी ज़िंदगी में फँस जाती हैं.
मगर आयशा की कहानी में एक मोड़ है - और वो ये कि भारत से बांग्लादेश लौटने से पहले उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक मर्मस्पर्शी चिट्ठी लिखी.
उसमें लिखा है कि उन्होंने भारत में अपने ग्राहकों से टिप में मिले कुछ पैसे बचा रखे हैं, मगर उनमें से अधिकतर पाँच सौ और हज़ार रुपए के पुराने नोट हैं, जो रद्द हो गए हैं. अत्यंत कष्ट और कलंक उठाकर कमाए गए उनके कुछ हज़ार रूपयों को यदि प्रधानमंत्री मोदी बदलवा दें, तो वो उनकी कृतज्ञ रहेंगीं.
इस भावुक चिट्ठी का रेस्क्यू फ़ाउंडेशन की रूपाली शिभारकर ने हिन्दी में अनुवाद किया, फिर हाथ से लिखी उस चिट्ठी को आयशा की ओर से प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट कर दिया गया.
मोदी और सुषमा नियमित रूप से अपने ट्वीट चेक करते हैं, और सुषमा स्वराज तो अक्सर मुश्किल में फंसे लोगों की मदद करती रही हैं, इसी उम्मीद से आयशा ने चिट्ठी लिखी.
उनकी इस चिट्ठी पर भारत के कई समाचार माध्यमों ने रिपोर्ट की. रेस्क्यू फ़ाउंडेशन की प्रमुख त्रिवेणी आचार्य ने बताया,"हमने जब पुलिस की मदद लेकर आयशा को बचाया, तो उसे एक कपड़े में उस इलाक़े से बाहर लाना पड़ा. उसके बाद कोर्ट-कचहरी-दूतावास की भागदौड़ के कारण उन्हें वहाँ से अपना सामान लाने का मौक़ा ही नहीं मिला."
"बाद में उसने जब बताया कि उसने कुछ पैसे छिपाकर रखे हैं, तो हम दोबारा वहाँ गए और एक ट्रंक के भीतर कपड़ों के बीच छिपाकर रखे गए 12-13 हज़ार रूपयों को बरामद किया."
चिट्ठी में आयशा ने बताया- ''बैंगलुरू के रेड लाइट एरिया में काम करते समय कोठे के मालिक हाथ में एक भी पैसा नहीं देते थे. मगर ग्राहक ख़ुशी से जो टिप देते थे, वो पेटीकोट के भीतर किसी तरह छिपाकर रख लेती थी, इनमें अधिकतर पाँच सौ और हज़ार रूपए के नोट थे.''
लेकिन 31 दिसंबर को नोट बदलने की समयसीमा समाप्त होने के बाद उनके ये पैसे बेकार हो गए. पुणे के कटराज घाट स्थित रेडलाइट इलाक़े से आयशा को बाहर निकालने में शहर की पुलिस कमिश्नर रश्मि शुक्ला ने व्यक्तिगत दिलचस्पी ली थी.
वो कहती हैं, "इस असहाय बांग्लादेशी लड़की के इतने कष्ट से कमाए गए पैसों के बर्बाद होने की बात सोचकर बहुत बुरा लग रहा है. उसकी चिट्ठी के बाद शायद केंद्र सरकार कुछ मदद करे. लेकिन अगर वो नहीं भी हो पाया, तो हम ये प्रयास करेंगे कि उसके बांग्लादेश लौटने से पहले उसे कुछ आर्थिक मदद दी जा सके."
दस हज़ार रुपए शायद कई लोगों के लिए कोई बहुत बड़ी रकम ना हो, मगर आयशा के लिए उनका मोल बहुत ज़्यादा है.
और अगर उनकी वापसी से पहले भारत सरकार उनके नोटों को बदल सके, तो ये ना केवल आयशा के लिए आर्थिक मदद भर होगी, बल्कि ये उनकी आगे की ज़िंदगी के लिए एक अमूल्य स्मृति बनकर भी रह जाएगी.

शनिवार, 6 मई 2017

दुनिया में पुरुषों की संख्या महिलाओं से ज्यादा क्यों होती है?

     
    विश्व की जनसंख्या सांख्यिकी का आंकड़ा कहता है कि दुनिया में महिला-पुरुष अनुपात 100:102 है. पैदा होने वाले बच्चों का लिंग अनुपात देखें तो पलड़ा पुरुषों की तरफ और झुक जाता है क्योंकि यह अनुपात 100:107 है. दुनियाभर में महिलाओं को बराबर अधिकार दिलाने के लिए लड़ रहे फेमिनिस्ट कुदरत की इस गैर-बराबरी पर क्या कहेंगे, यह लंबी चर्चा का विषय है इसलिए इस पर कभी और बात करेंगे. फिलहाल सवाल यह है कि दुनिया में पुरुषों की संख्या महिलाओं से हमेशा ही ज्यादा क्यों और कैसे रहती है?
    जीवविज्ञानियों का मत है कि आज हम जो असंतुलन देख रहे हैं, उसकी वजह भी संतुलन की कोशिश है. हजारों सालों के विकास के बाद हर बदलती हुई जीवनशैली में प्रकृति पुरुषों के अस्तित्व को लगातार संकट में पाती है. इसके साथ ही चिकित्सा विज्ञान मानता है कि किसी भी असामान्य परिस्थिति में मादा भ्रूणों की तुलना में नर भ्रूण के गर्भपात की संभावना ज्यादा होती है. वहीं जन्म के बाद पुरुषों का जीवन भी महिलाओं की तुलना में ज्यादा जोखिमभरा होता है. युद्ध, बीमारी या किसी बुरी आदत का शिकार होने से उनके जीवन पर हमेशा संकट बना रहता है. यह निश्चित रूप से उनकी संख्या को भी प्रभावित करता है.
    इसके उलट महिलाओं का जीवन अपेक्षाकृत सुरक्षित और आसान होता है. साथ ही महिलाओं में सर्वाइव करने की क्षमता भी ज्यादा होती है. ऐसे में प्रकृति यह मानकर चलती है कि जितनी महिलाएं पैदा की गई हैं उनमें से एक बड़ी संख्या अपना जीवन बचाने में सफल होगी, जबकि पुरुष ऐसा नहीं कर पाएंगे. इसलिए प्रकृति ज्यादा पुरुषों को पैदा कर अपना संतुलन साधने का प्रयास बनाए रखती है. प्रकृति में यह क्रम निरंतर चलने वाला है. जीवविज्ञान इसे फिशर सिद्धांत के नाम से जानता है. इसके अनुसार हर प्रजाति समय के साथ समान लैंगिक अनुपात की तरफ बढ़ती है. इस हिसाब से प्रकृति की यह व्यवस्था तब तक जारी रह सकती है, जब तक कि उस तक यह संदेश न पहुंचे कि पुरुष अब सुरक्षित हैं.

सार्क सैटेलाइट परियोजना से भारत ने ही उसे अलग किया:पाक


पाकिस्तान के विदेश विभाग के प्रवक्ता ने कहा- सार्क सैटेलाइट परियोजना को भारत अकेले ही पूरा करना चाहता था, इसलिए साथ देना संभव नहीं हुआ


सार्क सैटेलाइट परियोजना से बाहर होने के लिए पाकिस्तान ने भारत पर ही आरोप मढ़ दिया है. उसके मुताबिक, नई दिल्ली परस्पर सहयोग के आधार पर उपक्रम विकसित करने का इच्छुक नहीं था.
पाकिस्तान के विदेश विभाग के प्रवक्ता नफीस जकरिया ने शनिवार को कहा, ‘भारत ने 2014 में 18वें सार्क (दक्षिण एशिया सहयोग संगठन) शिखर सम्मेलन के दौरान साझा उपग्रह का तोहफा देने की पेशकश की थी. लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया था कि वह इसका अकेले निर्माण, प्रक्षेपण और संचालन भी करेगा.’ उन्हाेंने कहा, ‘इसमें पाकिस्तान भी अपनी विशेषज्ञ सेवाएं देना चाहता था. लेकिन भारत परस्पर सहयोग के आधार पर इसे आगे बढ़ाने को तैयार नहीं था. इसीलिए पाकिस्तान के लिए इसमें सहयोग देना संभव नहीं हो पाया.’
गौरतलब है कि भारत ने शुक्रवार को ही दक्षिण एशिया संचार उपग्रह (जीसैट-9) का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया है. इस उपग्रह को बनाने से लेकर प्रक्षेपण तक कुल 450 करोड़ रुपए का खर्च आया है. इसे पूरी तरह भारत ने उठाया है. भारत के इस प्रयास का बांग्लादेश, अफगानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव आदि सार्क के सभी सदस्य देशों ने स्वागत किया है. इस परियोजना से पाकिस्तान के बाहर होने के बाद इसका नाम बदलकर ‘सार्क सैटेलाइट’ के बजाय ‘दक्षिण एशिया संचार उपग्रह’ कर दिया गया था.

ट्रंप के खिलाफ अमेरिकी प्रेस का जंगी ऐलान..

कोलंबिया जर्नलिज्म रिव्यू की पब्लिशर कायल पोप ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक खास लेटर लिखा है. इस लेटर को उन्होंने यूएस प्रेस कॉर्प्स की तरफ से लिखा है. ये खुला पत्र मीडिया के उस पहलू को उजागर करता है जिसपर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया.
ट्रंप के नाम ये है पैगाम-
हम एक साथ काम करेंगे. आपने हमे अलग करने की कोशिश की है और कई परिवारों में लड़ाई करवाने की कोशिश की है. पर वो दिन अब खत्म हो रहे हैं. हमें अब समझ आ गया है कि आपकी कवरेज के लिए हमें एक जुट होना पड़ेगा. तो अब जब भी आप अगली प्रेस कॉन्फ्रेंस पर किसी रिपोर्टर पर चिल्लाएंगे जिसकी कोई बात आपको चुभी हो तब आपको सभी का सामना करना होगा. हम सभी ऐसी स्टोरी पर काम करेंगे जो सेंसेबल हों और इसका ध्यान रखेंगे कि दुनिया के सामने हमारे द्वारा लिखी गई बातें आएं. हम यकीनन हर बात पर सहमत नहीं होंगे, हमारे बीच बहस भी होगी कि क्या सही है और क्या नहीं, लेकिन ये बहस शुरू से अंत तक हमारी ही होगी.
डोनाल्ड ट्रंप के लिए लिखा गया खुला पत्र
इस पत्र में ट्रंप के कई ऐसे कृत्यों के बारे में बताया गया है जिसमें मीडिया वालों के साथ बदसलूकी की गई है.
पत्र के अन्य अंश-
1. आप मिलें तो ठीक नहीं तो और भी तरीके हैं- अगर आपको लगता है कि अपने एडमिनिस्ट्रेशन की एक्सेस देकर पत्रकारों पर कोई दया कर रहे हैं तो ऐसा नहीं है. हम किसी भी तरह से सच ढूंढ निकालेंगे. चाहें आप रैली में बैन ही क्यों ना कर दें. ये हमारे लिए चुनौती होगी.
2. क्या औपचारिक रहेगा और क्या आधिकारिक ये हम तय करेंगे- आप हमारे लिए नियम नहीं बना सकते. किस अधिकारी से कैसे बात करनी है ये हम ही तय करेंगे. आप नियम बनाएं और हम उन्हें मानें ऐसा नहीं होगा.
3. ये हम तय करेंगे कि किसको कितना समय देना है-सिर्फ आपके कहने पर हम आपके किसी वक्ता के लिए अपना ऑन एयर टाइम नहीं बढ़ाएंगे. हम तय करेंगे कि उन्हें कब पब्लिक के सामने भेजना है या कब बैन करना है.

शुक्रवार, 5 मई 2017

भारत का पड़ोसी देशों को तोहफा, दक्षिण एशिया उपग्रह जीसैट-9 सफलतापूर्वक लॉन्च


दक्षिण एशिया उपग्रह ‘जीसैट-9’ के सफल लॉन्च के साथ भारत ने अंतरिक्ष कूटनीति की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. इसे शुक्रवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से शाम चार बजकर 57 मिनट पर छोड़ा गया. इसके लॉन्च में 49 मीटर लंबे और 450 टन वजनी जीएसएलवी रॉकेट का इस्तेमाल किया गया. इस उपग्रह को बनाने से लेकर लॉन्च तक कुल 450 करोड़ रुपये का खर्च आया है, जिसे भारत ने उठाया है.
भारत द्वारा अपने पड़ोसी देशों को दिए गए इस तोहफे से संचार सुविधाएं मजबूत होंगी. इसके अलावा आपदा राहत के कार्यों में इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा. इसके आंकड़े नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका और अफगानिस्तान के साथ साझा किए जाएंगे. पाकिस्तान ने इस सैटेलाइट से कोई भी मदद लेने से इनकार कर दिया था. उसका तर्क है कि इन कामों के लिए उसका अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण एशिया उपग्रह के सफल लॉन्च को दक्षिण एशिया के लिए ऐतिहासिक दिन बताया है और इस सफलता के जश्न में शामिल होने के लिए अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका के नेताओं का आभार जताया है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘हमारा साथ आना इस बात का संकेत है कि हम अपने लोगों की आवश्यकताओं को सबसे आगे रखने के लिए कटिबद्ध हैं.’ वहीं, अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने कहा कि आज चर्चा और उस पर कार्रवाई के बीच का अंतर मिट गया है. उधर, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस उपलब्धि के लिए भारत को बधाई दी और इससे क्षेत्रीय सहयोग बढ़ने की उम्मीद जताई है. भूटान के प्रधानमंत्री शेहरिंग ताबगे ने कहा कि इस उपग्रह से क्षेत्रीय सहयोग और साझा क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलेगा. नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ने कहा कि इससे नेपाल के पहाड़ी और पर्वतीय इलाके में संचार सुविधा बहाल करने में मदद मिलेगी.
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के आठ सदस्य देशों में भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका के पास अपने उपग्रह हैं, जबकि अन्य के पास अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम नहीं है. भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम जहां स्वतंत्र और आत्मनिर्भर है, वहीं पाकिस्तान और श्रीलंका ने चीन की मदद के अपने-अपने उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं. अफगानिस्तान के पास यूरोपीय स्पेस एजेंसी से खरीदा गया एक संचार उपग्रह है. नेपाल और बांग्लादेश के पास अपना कोई उपग्रह नहीं है, लेकिन वे इसे हासिल करने की दिशा में तेजी से प्रयास कर रहे हैं.

गद्दारों के आगे दिल्ली, कब तक घुटने टेकेगी?


काश्मीर में पत्थर खाते,
और सुकमा में गोली।
आखिर "राजन' कब तक होगी,
मेरे संग ठिठोली?

सीमा पर ये हिज़ड़े कब तक
मेरी गर्दन काटेंगे?
बोलो कब तक हम कुत्तो को
"निंदा" बिस्किट बाँटेंगे?

गद्दारों के आगे दिल्ली
कब तक घुटने टेकेगी?
मेरा शौर्य पराक्रम दुनिया,
आखिर किस दिन देखेगी?

एक बार ओ छप्पन इंची,
मेरी बाँहें खोल तो।
एक शब्द बस "आक्रमण"
तू अपने मुंह से बोल तो।

जिस नापाक जमीं को दुनिया
आज कह रही "पाकिस्तान"
लाशों के अम्बार देख उसे
बोल पड़ेगी "कब्रिस्तान"

योगी का एक मंत्री.. जिसे निपटाने के लिए रचा गया बड़ा षडयंत्र हुआ नाकाम

  सुशील अवस्थी 'राजन' चित्र में एक पेशेंट है जिसे एक सज्जन कुछ पिला रहे हैं। दरसल ये चित्र आगरा के एक निजी अस्पताल का है। पेशेंट है ...