शुक्रवार, 26 जुलाई 2019
शनिवार, 8 जून 2019
जिम्मेदारों से सवाल मतलब बवाल
दो दिन से अखबार- टीवी- सोशल मीडिया से नजरें चुरा रहा हूं, डर रहा हूं कि कहीं उस बच्ची की तस्वीर दिख न जाए, उसके साथ जो क्रूरता हुई उसकी डीटेलिंग से बच रहा हूं। आप कहोगे कि सच्चाई नजरें चुराने से बदल नहीं जाएगी, लेकिन मैं एक बच्ची का पिता हूं, मेरे लिए आपकी आदर्शवादी बातें बेकार हैं। मैं पिता न भी होता तो इतना संवेदनशील हूं कि खून देखकर धड़कन बढ़ जाती है।
हम एक फ़ेल्ड सोसाइटी हैं, हमारी प्राथमिकताएं इस बात की चुगली करती हैं। एक जुर्म, एक पाप, एक घिनापा था जो हो गया। बारीकी से देखिए कि हमारा समाज इस पर रिएक्ट कैसे कर रहा है? मैं मीडिया में हूं। यहां इसकी वीभत्स हेडलाइन्स अपनी पीठ ठोंकते हुए आगे सरकाई जाती हैं। जितनी भीषण हेडलाइन उतनी आत्म संतुष्टि। जो जितनी डीटेलिंग डरावनी आवाज के साथ विजुअल में दिखा पाए उसकी उतनी अच्छी टीआरपी, उतने अच्छे पेज व्यूज।
हमारे हाथ में स्मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्शन था। हम अपनी आवाज जिम्मेदार लोगों तक पहुंचा सकते थे। वो जिम्मेदार लोग जिन्हें आपने वोट देकर जिम्मेदारी सौंपी। वो जिम्मेदार जो ये तय कर सकते हैं कि ऐसी क्रूरता फिर से होने के चांस कम हो जाएं। लेकिन वो जिम्मेदार जेल में बलात्कार के आरोपियों से धन्यवाद मीटिंग करने जाते हैं। हमारे मुंह से एक शब्द नहीं निकलता। जिस सूबे में हुई क्रूरता पर पूरा देश उबला हुआ है, उस सूबे का मुख्यमंत्री अलीगढ़ न जाकर अयोध्या में मूर्ति अनावरण करने जाता है। हम उससे सवाल नहीं पूछते। जिम्मेदार लोगों से सवाल करना हमारी प्राथमिकता में नहीं है.
हमने घिनौना चेहरा छिपाने के लिए नए टर्म्स बनाए हैं. मोमबत्ती गैंग, टुकड़े टुकड़े गैंग, अवॉर्ड वापसी गैंग. ये गैंग निर्भया पर भी मोमबत्ती जलाते हैं, आसिफा पर भी मोमबत्ती जलाते हैं, उन्नाव की बेटी पर भी मोमबत्ती जलाते हैं और इस बच्ची के लिए भी जला रहे हैं. हमारी प्राथमिकता ये है कि हम इन्हें याद दिलाते रहते हैं 'उस पर तो प्लकार्ड दिखाए थे, इस पर क्यों नहीं?' ये हमारी ड्यूटी है. हमारी ड्यूटी है कि हम मुख्यमंत्री स्वरा भास्कर से सवाल करें कि आपकी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस क्यों सोती रही? हम प्रधानमंत्री प्रकाश राज को ट्रोल करें कि जब देश उबल रहा है तो तुम खुद को कमल के फूलों से तुलवा रहे हो. हम आसिफा के कातिलों को बचाने के लिए तिरंगा यात्रा निकालें. हम आरोपी का मुस्लिम नाम देखते ही बच्ची को न्याय दिलाने वाले देवदूत बन जाएं, फिर भी हम अपने हृदय सम्राटों से नहीं, हिरोइनों से सवाल करें. ये हमारी प्राथमिकता है.
ये नहीं बंद होने वाला. कभी नहीं बंद होने वाला. बेहद घिनौने समय में घटिया मानसिकता वालों के बीच हम जी रहे हैं. ये क्रूरता की शिकार बच्चियों के नाम रिप्लेस करके कल्पनाएं गढ़ने वालों की जय जयकार करने का समय है. ये जिम्मेदारी तय करने का नहीं, जिम्मेदारी से भागने का समय है. जिम्मेदारों को बचाने के लिए गन्दे तर्कों की ढाल रचने का समय है। हम कौन हैं, हमें पहचान लो और अपने बच्चों को हमसे दूर रखो. हम बहुत गंदे लोग हैं.
आशुतोष उज्ज्वल जी की वाल से साभार
शुक्रवार, 31 मई 2019
रीता बहुगुणा जोशी के सांसद निर्वाचित होने के बाद लखनऊ की कैंट सीट से कौन होगा उनका उत्तराधिकारी ?
योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री रीता बहुगुणा जोशी अब इलाहाबाद से सांसद निर्वाचित हो चुकी हैं। लखनऊ की कैंट सीट से विधायक रीता के सांसद बन जाने के बाद अब उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ेगी। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार अगले छः महीनों में यहाँ उप चुनाव होगा। अब सवाल यह उठता है कि भाजपा अब यहाँ से किसे अपना उम्मीदवार बनाएगी। ऐसी आशा है कि भाजपा जिसे भी अपना उम्मीदवार घोषित करेगी, वही विधायकी जीतेगा। क्योंकि इस सीट को भाजपा की परम्परागत सीट माना जाता है। इस सीट के इतिहास पर निगाह डालें तो स्पष्ट दिखता है कि जो भी भाजपा का टिकट पायेगा वही यहाँ से अगला विद्यायक होगा।
2012 में कांग्रेसी रीता जोशी ने यहाँ से लगातार तीन बार विधायक रहे भाजपा के सुरेश तिवारी को हराकर इस सीट पर आपना वर्चस्व कायम किया था। उसके बाद 2017 के विधान सभा चुनाव में रीता ने पाला बदल करते हुए भाजपा के झंडे तले लड़ते हुए इस सीट पर अपना परचम लहराया था। परन्तु अब वो सांसद बन चुकी हैं , इसलिए यहाँ उप चुनाव अवश्यंभावी है। यहाँ से लगातार विधायक रहे सुरेश चंद्र तिवारी अब उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद भाजपा उन्हें फिर से इस सीट पर अपना उम्मीदवार घोषित कर दे। सुरेश चंद्र तिवारी इस वक्त भाजपा में अवध क्षेत्र के अध्यक्ष हैं। पार्टी की रीतियों नीतियों को ठीक से समझने वालों का मानना है कि बतौर अध्यक्ष ठीक से काम कर रहे तिवारी जी पर शायद ही पार्टी दांव लगाएगी। ये एक व्यक्ति एक पद की तर्ज पर चल रही पार्टी की नीतियों के खिलाफ होगा।
दूसरे नंबर के प्रबल दावेदारों में यहाँ से अरविन्द त्रिपाठी "गुड्डू" को माना जा रहा है। 2007 में इसी सीट से बहुजन समाज पार्टी से उम्मीदवार रहे पूर्व एमएलसी गुड्डू त्रिपाठी इस समय भाजपा में हैं। भाजपा की इस परम्परागत सीट पर उस दौरान त्रिपाठी ने बसपा के लिए अच्छे खासे वोट बटोरे थे। भाजपा के सुरेश चंद्र तिवारी किसी तरह अपनी और पार्टी की लाज बचाने में कामयाब हो सके थे। प्रदेश की राजनीति में फिर से अपना बर्चस्व कायम कर रही बसपा को सबक सिखाने के लिए भी भाजपा गुड्डू त्रिपाठी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दे तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।
अन्य दावेदारों में रीता जोशी के पुत्र मयंक जोशी को यहाँ से अगला उम्मीदवार माना जा रहा है। लेकिन इनकी दावेदारी को पार्टी शायद ही तरजीह दे। क्योंकि रीता जोशी के बाद फिर से उनके पुत्र को टिकट देने का सीधा सन्देश यही होगा कि पार्टी वंशवाद को प्रोत्साहित कर रही है। जो कि पार्टी नहीं करना चाहेगी।
एक और उम्मीदवार अभिजात मिश्रा की भी चर्चा कायम है। अभिजात इस वक्त भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय नेता हैं। अपने राष्ट्रीय नेता को शायद ही पार्टी क्षेत्रीय रोल देना पसंद करेगी ? अन्य नामों में पूर्व में बसपा से इसी सीट से उम्मीदवार रहे योगेश दीक्षित जो इस समय भाजपाई हैं। उनका भी नाम लिया जा रहा है। यहीं से एक पार्षद सुशील तिवारी पम्मी भी टिकट की दौड़ में गिने जा रहे हैं। फिलहाल तो यह एक आंकलन है। सही भी हो सकता है गलत भी। पार्टी किसे अपना उम्मीदवार बनाएगी और किसे नहीं ये तो पार्टी ही जानें, लेकिन यह बात एकदम सही है कि पैरासूट प्रत्याशी यहाँ असफल भी हो सकता है, इसलिए उम्मीदवार स्थानीय होगा इसकी पूरी संभावना है।
लखनऊ कैंट से सुशील अवस्थी "राजन" की रिपोर्ट
शनिवार, 18 मई 2019
सिप्स हॉस्पिटल लखनऊ की खुली लूट
सिप्स हॉस्पिटल ने यूपी की राजधानी लखनऊ में खुली लूट मचा रखी है। डेड बॉडी को हॉस्पिटल में एडमिट कर लेना फिर उसके इलाज के नाम पर हज़ारों रुपया ऐंठ लेना अब इस अस्पताल का शगल बन चुका है। इस तरह के मामले कई बार प्रकाश में आ चुके हैं, परन्तु सबूत न होने की वजह से अस्पताल हर बार बचता रहा है। इस बार सिप्स ने खुद ही मरीज़ को पहले डेथ सर्टिफिकेट जारी किया, उसके बाद उस डेड बॉडी को एडमिट कर दिन भर इलाज कर हज़ारों रूपये हड़प लिए।
इस मामले को लेकर पीड़ित परिजनों ने जब लखनऊ के सीएमओ नरेंद्र अग्रवाल से मुलाकात कर उनसे सिप्स हॉस्पिटल की खुली लूट की शिकायत की तो जैसा कि ऐसे मामलों में प्रशासन का एक तोता रटंत बयान होता है, वही दुहराकर सीएमओ साहब ने भी अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली है। उन्होंने माना कि इस मामले में अस्पताल का रवैया फ़िलहाल दोषी प्रतीत होता है, हम उसके खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई करेंगे, परन्तु उनके इस बयान के महीनों बीत जानें के बाद भी आज भी पीड़ित को कोई इंसाफ नहीं मिल सका है।
रिपोर्ट- सुशील अवस्थी "राजन" 9454699011
इस मामले को पूरी तरह समझने के लिए आपको यह वीडिओ गौर से देखना चाहिए
गुरुवार, 24 जनवरी 2019
दुख से दुखी न होना
अपने भटके बंदों को वापस बुलाने के लिये परमेश्वर कभी कभी दुख का उपहार भेजते हैं। सुग्रीव जब राजरंग में व्यस्त हो गया तो श्री राम ने उसे वापस बुलाने के लिये लक्ष्मण को भेजा। 'तब लछिमन समझावा रघुपति करुऩासींव भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव'.लक्ष्मण शेषावतार के रूप में महाकाल हैं। अब किसी को बिस्तर पर यदि सर्प बैठा दिखाई दे तो वह घर छोड़ कहीं भी भाग सकता है, परंतु भय के ऱूप में जो दुख है उसका सर्वाधिक सदुपयोग यह है कि उन क्षणों में परमेश्वर याद आये। कामकाज में लगे सुग्रीव को रामकाज की याद आ गयी।
दुख के क्षणों का सदुपयोग लंका में अशोकवाटिका में बैठी सीता कर रही हैं। श्री राम ने लंका से वापस लौटे हनुमान से पूछा 'कहहु तात केहि भांति जानकी रहति करति रक्षा स्वप्रान की'. हनुमान जी ने उत्तर दिया 'नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट लोचन निज पद जंत्रित प्रान जाहिं केहि वाट'.दिनरात नामजप का पहरा लगा हुआ है और ध्यान का किवाड़ बंद कर नेत्रों को अपने पैरों की ओर ही केंद्रित कर दिया है जिससे प्राण निकल नहीं पा रहे हैं। श्री राम ने चिंता व्यक्त की कि मनसा वाचा कर्मणा मेरे प्रति समर्पित होने के बाद भी सीता कितनी दुखी हैं? तो हनुमान जी ने उन्हे दुख की सच्ची परिभाषा बता दी 'कह हनुमंत विपति प्रभु सोई जब तव सुमिरन भजन न होई'. प्रभु आपके वियोगजन्य दुख ने सीता को आपके भजन में लीन होने का अवसर प्रदान कर दिया जिससे वे दुखानंद की अनुभूति में डूबी हुई हैं।
कबीर ने दुख की महिमा गायी 'दुख वह सुख की खान है साहब आवें याद वही घरी बस घरी है बाकी सब बरबाद'. वे कहते हैं सुख की स्थितियां बेकार हैं उनसे कोई फायदा नहीं वल्कि दुख की स्थितियां बड़ी सुखदायक हैं 'सुख के माथे सिल परै जो नाम हृदय से जाय बलिहारी वा दुख की जो रामहि राम रटाय' दुख के क्षणों की विशेषता है कि दुखी व्यक्ति से पाप की संभावना नहीं जबकि सुखी व्यक्ति के जीवन में पाप की संभावना बनी रहती है। पाप हमेशा हंसते हुए होता है रोते हुए व्यक्ति से पाप नहीं होता। कबीर ने कहा 'हंसि हंसि कंता न मिला जिन पाया तिन रोय जौ हंसि हंसि कंता मिलै काहे दुहागिनि होय'
![]() |
| वीर विक्रम बहादुर मिश्र |
सोमवार, 17 दिसंबर 2018
अपना इकबाल खोती योगी सरकार
आईपी सिंह, वरिष्ठ भाजपा नेता, यूपी
प्रचंड बहुमत की सरकार है लेकिन जनता नदारद है--- -सत्ता के गलियारे की चमक,कालिदास मार्ग जिसपर मा0 मुख्यमंत्री जी का सरकारी आवास है। यह इलाका दशकों से अपनी चमक बिखेरता रहा है। सनद रहे कि CM आवास के साथ वरिष्ठ मंत्रियों के ज्यादातर आवास इसी मार्ग पर है साथ में विक्रमादित्य मार्ग भी चर्चा का केंद्र रहा है। उसी के साथ माल-एवेन्यू में भी मंत्रियों के निवास स्थल है। यहाँ कई पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास है। किसी भी सरकार के काम-काज का आकलन यहाँ से शुरू होकर विधानसभा, एनेक्सी,आज का आधुनिक लोकभवन पर समाप्त होता है। और पार्टी मुख्यालय आम कार्यकर्ता के लिए जुटने का और जब सरकार रहती है तो सत्ता का बड़ा केंद्र रहता है। दो दशक पूर्व जब मन्त्रियों के आवासों पर गहमागहमी दिनरात देखी जाती थी। प्रदेशभर से जनताअपने विभिन्न कार्यो को लेकर विधायकों के साथ आवा-जाही उनकी बनी रहती थी। सुबह 2 जनता मंत्रियों के आवास पर धमक जाती थी। और मिलने का सिलसिला 11 बजे दिन तक चलता रहता था।
ततपश्चात मंत्रियों के कारों का काफिला एक एक कर विधान सभा में प्रवेश करता था। और दिनभर अफसरों के साथ मीटिंग, समीक्षा आदि चलती रहती थी। चूंकि समयाभाव के कारण बहुत से मंत्रियों का दिन का भोजन उनके घर से अक्सर दफ्तर में आ जाता था।
अपने काम के प्रति एक जुनून स्वयं हमने अपनी आँखों से देखा है। और जैसे ही दिन के तीन बजते थे। आम जनता मंत्रियों के चेम्बर में धमक जाती थी,और सबकी सुनवाई होती थी। एक वाकया मुझे याद है मा0 कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। श्री रविन्द्र शुक्ला जी शिक्षा मंत्री थे। एक कार्यक्रम के सिलसिले में मैं उनसे मिलने विधानसभा में उनके कक्ष में पहुँचा तो देखा आपका चेम्बर खचाखच भरा हुआ था।और वे स्वयं उठकर सबसे प्रार्थना पत्र ले रहे थे। क्योंकि तब कार्य संस्कृति टालने की नही थी। मंत्रियों अफसरों में भय रहता था कि यदि काम नही करूँगा तो मेरी कुर्सी चली जायेगी। बिना रोकटोक के कार्यकर्ता छोड़िए आम जनता मंत्रियों से भेंट कर लेती थी। मेरा मानना है कि "सरकार इकबाल से चलती है"।
तब मंत्रियों से मिलने का समय निर्धारित होता था। सप्ताह में सोमवार के लेकर शुक्रवार की शाम तक मंत्री जमकर सरकारी आवास से लेकर विधानसभा तक अपना विभागीय कार्य करते थे। शनिवार और रविवार अपने निर्धारित कार्य से प्रदेश का दौरा या अपने 2 क्षेत्र चले जाते थे। मंत्रियों के लिए अपने आफिस में बैठना और सरकारी कार्य करना अनिवार्य होता था। वक्त बदला और उसी के साथ सब कुछ बदल गया।
मित्रों अब वो दौर भी चला गया। जब फोटो खींचने के लिए कैमरे की जरूरत पड़ती थी और कैमरा सब जगह ले जाना भी मना था। आजका दौर पहले से बहुत बेहतर है। हर हाथ में मोबाइल और उसमें कैमरा लगा है।
अपने खुले कैमरे के साथ सबसे पहले चीर परिचित स्थान कालिदास मार्ग पर ले चलता हूँ। जाइये और देखिए कितने मंत्री अपने आवास पर मौजूद हैं क्या उनकी लोकप्रियता के कारण उनके घर के बाहर कार्यकर्ता या या जनता मौजूद है आप सब जगह निरीक्षण करिये जहाँ 2 मंत्रियों के निवास है आपको ज्यादातर सन्नाटा मिलेगा। हाँ सुरक्षा में तैनात गारद और गिने चुने मंत्रियों के करीबी लोग मिल सकते है। उससे ज्यादा कुछ नही,जनता के लिए विधानसभा के अंदर प्रवेश पर बहुत सख्ती है लेकिन जो दलाल किस्म के लोग है चाहे जिसकी सरकार हो उनका प्रवेश धड़ल्ले से होता है पास उन्ही का बनता है जिसे मंत्री का स्टाफ पर्ची भेजेगा वो भी सीमित फिर जनता मंत्री से कैसे मिल सकती है । अब दिन में 3 बजे के बाद कोई मंत्री जनता से मिलने के लिए नही बैठता है। दो माह पूर्व दिल्ली से कुछ वरिष्ठ पत्रकार आये थे। उन लोगों ने कहाँ यदि कुछ मंत्रियों से हम लोगों की भेंट हो जाती तो यूपी के विकास पर एक रिपोर्ट बना ली जाती, मित्रों मैं उन लोगों के साथ विधानसभा के दोनों भवनों में मंत्रीगण से मिलने के लिए घूमता रहा। वो पूरा वीरान पड़ा था। वहां कोई भी मंत्री मौजूद नही था। उनके दफ्तर जरूर खुले थे। लेकिन कोई काम काज नही हो रहा था।जानकारी किया तो पता चला कि विधानसभा अध्यक्ष जी आये है हम सब ऊपरी फ्लोर पर पहुँचे तो मा0 विधानसभा अध्यक्ष जी से हम लोगों की 10 मिनट की भेंट हुई। मैं मानसिक रूप से संतुष्ट हुआ कि चलो किसी से तो भेंट हुई। आजके दौर में मंत्री फाइले अपने घर पर करते है। दो साल होने को है और दो मंत्री रेगुलर अपने सरकारी दफ्तर में नही बैठते है। ज्यादातर मंत्री अक्सर दौरे पर रहते है और उनके दौरे विभागीय होते है या राजनैतिक, या व्यक्तिगत किसी को नही पता,उसकी जानकारी सार्वजनिक नही होती। विधानसभा में यदि मंत्रियों की अफसरों की biometric व्यवस्था कर दी जाय और उसकी रिपोर्ट प्रकाशित हो तो तहलका मच जायेगा। क्योंकि मान्यवर लोग दफ़्तर नही आते है,मीटिंग घर पर करते है फिर लाख टके का एक सवाल--
सरकार अफसरों से कैसे उम्मीद कर सकती है कि वे अपने दफ्तर में बैठकर देर रात तक काम करेंगे। यकिन मानिये बिश्वास कीजिये। आज सब कुछ पटरी से उतर चुका है। भाजपा सरकार से जनता को बड़ी उम्मीदें थीं क्या हमारे मंत्रीगण विधायक,अफसर उसपर 100 प्रतिशत खरे उतरे रहे है। मंत्रियों में जो लाज और भय रहना चाहिए वो बिल्कुल खत्म हो गया है। यदि किसी सरकार का कार्य देखना है तो तेलंगाना,आन्ध्र प्रदेश का कार्य संस्कृति अवश्य देखना चाहिए। आपकी आँखे खुली की खुली रह जायेगी। सरकार बनने के बाद नेतागिरी से काम नही होगा। काम बैठकर करना होगा तक कार्य पूरे होंगे तब जाकर जनता और प्रदेश को सरकार का काम दिखाई देगा।
सत्यमेव जयते
बुधवार, 12 दिसंबर 2018
नोटा के सोंटा से तिलमिला उठी है भाजपा
सुशील अवस्थी "राजन"
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस को बहुमत न मिलने के पीछे नोटा को मुख्य वजह माना जा रहा है। कम से कम 14 सीटें ऐसी हैं जहां नोटा यानी ‘नन ऑफ द अबव’ दोनों दलों के लिए विलेन साबित हुआ है। 230 सीटों में से 14 सीटों पर हार का अंतर नोटा में पड़े वोट से भी कम था। इससे पहले कर्नाटक चुनावों में भी नोटा ने 8 सीटों पर भाजपा की जीत को हार में तब्दील कर दिया था। चुनाव आयोग के आंकड़ों पर नजर डालें तो मध्यप्रदेश में बहुमत का समीकरण नोटा के चलते बिगड़ा है।
मध्यप्रदेश चुनावों में डेढ़ फीसदी (4,666,26) वोटरों ने नोटा पर बटन दबाया था। राजनीतिक विश्लेषक इस परिस्थिति के लिए दोनों दलों के बूथ मैनेजमेंट को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर दोनों दलों ने मतदाताओं को विश्वास जीता होता तो, इतनी संख्या में नोटा के वोट नहीं पड़ते। उनका कहना है कि जिस तरह से भाजपा और कांग्रेस बराबरी पर हैं, इससे साफ हो गया है कि इस बार का चुनाव पूरी तरह से नोटा के शिकंजे में रहा है।
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस को बहुमत न मिलने के पीछे नोटा को मुख्य वजह माना जा रहा है। कम से कम 14 सीटें ऐसी हैं जहां नोटा यानी ‘नन ऑफ द अबव’ दोनों दलों के लिए विलेन साबित हुआ है। 230 सीटों में से 14 सीटों पर हार का अंतर नोटा में पड़े वोट से भी कम था। इससे पहले कर्नाटक चुनावों में भी नोटा ने 8 सीटों पर भाजपा की जीत को हार में तब्दील कर दिया था। चुनाव आयोग के आंकड़ों पर नजर डालें तो मध्यप्रदेश में बहुमत का समीकरण नोटा के चलते बिगड़ा है।
मध्यप्रदेश चुनावों में डेढ़ फीसदी (4,666,26) वोटरों ने नोटा पर बटन दबाया था। राजनीतिक विश्लेषक इस परिस्थिति के लिए दोनों दलों के बूथ मैनेजमेंट को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर दोनों दलों ने मतदाताओं को विश्वास जीता होता तो, इतनी संख्या में नोटा के वोट नहीं पड़ते। उनका कहना है कि जिस तरह से भाजपा और कांग्रेस बराबरी पर हैं, इससे साफ हो गया है कि इस बार का चुनाव पूरी तरह से नोटा के शिकंजे में रहा है।
मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों को 41.2 प्रतिशत वोट मिले हैं। आंकड़ों पर नजर डालें, तो मध्यप्रदेश की वारासिवनी सीट पर निर्दलीय प्रदीप जायसवाल को 45612 वोट मिले, जबकि भाजपा के योगेश निर्मल को 44663 वोच मिले। वहीं नोटा में 1045 वोट पड़े। वहीं टीकमगढ़ में कांग्रेस प्रत्याशी को 44384 और भाजपा को 44573 और नोटा को 986 वोट पड़े। सुवासरा विधानसभा में भाजपा को 89712 और कांग्रेस को 89364 और नोटा पर 2874 वोट पड़े। गरोथ में भाजपा को 72219 और कांग्रेस को 69953, वहीं नोटा को 2351 वोट मिले।
राजनगर विधानसभा सीट की बात करें, तों यहां भाजपा के उम्मीदवार को 34807 वोट और कांग्रेस के प्रत्याशी को 34139 वोट पड़े, जबकि नोटा के पक्ष में 2133 वोट पड़े। नेपानगर में कांग्रेस को 85320, भाजपा को 84056 और नोटा को 2551 वोट पड़े। मान्धाता में कांग्रेस को 71228, भाजपा को 69992 और नोटा को 1575 वोट पड़े। कोलारस में भाजपा को 71173 और कांग्रेस को 70941, जबकि नोटा पर 1649 वोट पड़े। जोबाट सीट पर नोटा में 5139 वोट पड़े, जबकि दोनों दलों के प्रत्याशियों की जीत का अंतर 2500 सौ वोटों का रहा। जओरा सीट पर नोटा के पक्ष में 1500 वोट पड़े, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी को जीत के लिए मात्र 700 वोट चाहिए थे।
वहीं पन्ना जिले के गुनौर विधानसभा में नोटा पर 3734 वोट पड़े, जबकि कांग्रेस को 57657 और भाजपा को 55674 वोट पड़े। वहीं यूपी की सीमा से लगने वाले चंदला में नोटा के पक्ष में 2695 वोट पड़े, जबकि जीत का अंतर 1100 वोटों से भी कम रहा। वहीं बीना विधानसभा में नोटा पर 1528 वोट गिरे, जबकि जीत का अंतर 600 वोटों से कम रहा। वहीं ब्यावरा में नोटा पर 1481 वोट गिरे, जबकि कांग्रेस को 75569 और भाजपा को 74743 वोट मिले।
भैंसदेही में सबसे ज्यादा 7706 वोट नोटा में पड़े और तकरीबन 13 से ज्यादा विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे, जहां पांच हजार से ज्यादा वोट नोटा के पक्ष में गिरे। वहीं मध्यप्रदेश में तीसरी ताकत बनने वाली आम आदमी पार्टी को नोटा से करारा झटका लगा है। नोटा को मिले वोटटा प्रतिशत आप को मिले वोटों से कहीं ज्यादा है। आप को 0.7 प्रतिशत के साथ देर शाम तक 2,408,79 वोट हासिल हुए हैं।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
योगी का एक मंत्री.. जिसे निपटाने के लिए रचा गया बड़ा षडयंत्र हुआ नाकाम
सुशील अवस्थी 'राजन' चित्र में एक पेशेंट है जिसे एक सज्जन कुछ पिला रहे हैं। दरसल ये चित्र आगरा के एक निजी अस्पताल का है। पेशेंट है ...
-
विभीषण द्वारा रावण को समझाने के लिए तुलसीदास अपने महाकाव्य राम चरित मानस के सुन्दरकाण्ड में यह सुन्दर चौपाई लिखते है- काम, क्रोध, मद, ...
-
धरती के भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर उत्तर प्रदेश में गरीबों की जान से खेल रहे है। सरकारी अस्पतालों में कार्यरत अधिकतर डॉक्टर प्राइवेट प्र...
-
सुशील अवस्थी 'राजन' चित्र में एक पेशेंट है जिसे एक सज्जन कुछ पिला रहे हैं। दरसल ये चित्र आगरा के एक निजी अस्पताल का है। पेशेंट है ...







