शुक्रवार, 31 मई 2019

रीता बहुगुणा जोशी के सांसद निर्वाचित होने के बाद लखनऊ की कैंट सीट से कौन होगा उनका उत्तराधिकारी ?

योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री रीता बहुगुणा जोशी अब इलाहाबाद से सांसद निर्वाचित हो चुकी हैं। लखनऊ की कैंट सीट से विधायक रीता के सांसद बन जाने के बाद अब उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ेगी। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार अगले छः महीनों में यहाँ उप चुनाव होगा। अब सवाल यह उठता है कि भाजपा अब यहाँ से किसे अपना उम्मीदवार बनाएगी। ऐसी आशा है कि भाजपा जिसे भी अपना उम्मीदवार घोषित करेगी, वही विधायकी जीतेगा। क्योंकि इस सीट को भाजपा की परम्परागत सीट माना जाता है। इस सीट के इतिहास पर निगाह डालें तो स्पष्ट दिखता है कि जो भी भाजपा का टिकट पायेगा वही यहाँ से अगला विद्यायक होगा। 

2012 में कांग्रेसी रीता जोशी ने यहाँ से लगातार तीन बार विधायक रहे भाजपा के सुरेश तिवारी को हराकर इस सीट पर आपना वर्चस्व कायम किया था। उसके बाद 2017 के विधान सभा चुनाव में रीता ने पाला बदल करते हुए भाजपा के झंडे तले लड़ते हुए इस सीट पर अपना परचम लहराया था। परन्तु अब वो सांसद बन चुकी हैं , इसलिए यहाँ उप चुनाव अवश्यंभावी है। यहाँ से लगातार विधायक रहे सुरेश चंद्र तिवारी अब उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद भाजपा उन्हें फिर से इस सीट पर अपना उम्मीदवार घोषित कर दे। सुरेश चंद्र तिवारी इस वक्त भाजपा में अवध क्षेत्र के अध्यक्ष हैं। पार्टी की रीतियों नीतियों को ठीक से समझने वालों का मानना है कि बतौर अध्यक्ष ठीक से काम कर रहे तिवारी जी पर शायद ही पार्टी दांव लगाएगी। ये एक व्यक्ति एक पद की तर्ज पर चल रही पार्टी की नीतियों के खिलाफ होगा। 

दूसरे नंबर के प्रबल दावेदारों में यहाँ से अरविन्द त्रिपाठी "गुड्डू" को माना जा रहा है। 2007 में इसी सीट से बहुजन समाज पार्टी से उम्मीदवार रहे पूर्व एमएलसी गुड्डू त्रिपाठी इस समय भाजपा में हैं। भाजपा की इस परम्परागत सीट पर उस दौरान त्रिपाठी ने बसपा के लिए अच्छे खासे वोट बटोरे थे। भाजपा के सुरेश चंद्र तिवारी किसी तरह अपनी और पार्टी की लाज बचाने में कामयाब हो सके थे। प्रदेश की  राजनीति में फिर से अपना बर्चस्व कायम कर रही बसपा को सबक सिखाने के लिए भी भाजपा गुड्डू त्रिपाठी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दे तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।  

अन्य दावेदारों में रीता जोशी के पुत्र मयंक जोशी को यहाँ से अगला उम्मीदवार माना जा रहा है।  लेकिन इनकी दावेदारी को पार्टी शायद ही तरजीह दे। क्योंकि रीता जोशी के बाद फिर से उनके पुत्र को टिकट देने का सीधा सन्देश यही होगा कि पार्टी वंशवाद को प्रोत्साहित कर रही है।  जो कि  पार्टी नहीं करना चाहेगी। 

एक और उम्मीदवार अभिजात मिश्रा की भी चर्चा कायम है। अभिजात इस वक्त भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय नेता हैं। अपने राष्ट्रीय नेता को शायद ही पार्टी क्षेत्रीय रोल देना पसंद करेगी ? अन्य नामों में पूर्व में बसपा से इसी सीट से उम्मीदवार रहे योगेश दीक्षित जो इस समय भाजपाई हैं। उनका भी नाम लिया जा रहा है। यहीं से एक पार्षद सुशील तिवारी पम्मी भी टिकट की दौड़ में गिने जा रहे हैं। फिलहाल तो यह एक आंकलन है। सही भी हो सकता है गलत भी। पार्टी किसे अपना उम्मीदवार बनाएगी और किसे नहीं ये तो पार्टी ही जानें, लेकिन यह बात एकदम सही है कि पैरासूट प्रत्याशी यहाँ असफल  भी हो सकता है, इसलिए उम्मीदवार स्थानीय होगा इसकी पूरी संभावना है। 
लखनऊ कैंट से सुशील अवस्थी "राजन" की रिपोर्ट

शनिवार, 18 मई 2019

सिप्स हॉस्पिटल लखनऊ की खुली लूट



   सिप्स हॉस्पिटल ने यूपी की राजधानी लखनऊ में खुली लूट मचा रखी है। डेड बॉडी को हॉस्पिटल में एडमिट कर लेना फिर उसके इलाज के नाम पर हज़ारों रुपया ऐंठ लेना अब इस अस्पताल का शगल बन चुका है। इस तरह के मामले कई बार प्रकाश में आ चुके हैं, परन्तु सबूत न होने की वजह से अस्पताल हर बार बचता रहा है। इस बार सिप्स ने खुद ही मरीज़ को पहले डेथ सर्टिफिकेट जारी किया, उसके बाद उस डेड बॉडी को एडमिट कर दिन भर इलाज कर हज़ारों रूपये हड़प लिए। 


   इस मामले को लेकर पीड़ित परिजनों ने जब लखनऊ के सीएमओ नरेंद्र अग्रवाल से मुलाकात कर उनसे सिप्स हॉस्पिटल की खुली लूट की शिकायत की तो जैसा कि ऐसे मामलों में प्रशासन का एक तोता रटंत बयान होता है, वही दुहराकर सीएमओ साहब ने भी अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली है।  उन्होंने माना कि इस मामले में अस्पताल का रवैया फ़िलहाल दोषी प्रतीत होता है, हम उसके खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई करेंगे, परन्तु उनके इस बयान के महीनों बीत जानें के बाद भी आज भी पीड़ित को कोई इंसाफ नहीं मिल सका है। 

रिपोर्ट- सुशील अवस्थी "राजन" 9454699011 


इस मामले को पूरी तरह समझने के लिए आपको यह वीडिओ गौर से देखना चाहिए 


गुरुवार, 24 जनवरी 2019

दुख से दुखी न होना

   

दुख के क्षणों की विशेषता है कि इससे प्रभु को पाने की पात्रता का विकास होता है। भरी सभा में द्रोपदी यदि अपमानित न होती तो उसे श्री कृष्ण की अनुभूति कैसे होती। जो परमेश्वर की याद दिलाये वह किसी पुण्य का परिणाम है और जो परमेश्वर की याद भुलाये वह किसी  पाप का परिणाम है। 
    
अपने भटके बंदों को वापस बुलाने के लिये परमेश्वर कभी कभी दुख का उपहार भेजते हैं। सुग्रीव जब राजरंग में व्यस्त हो गया तो श्री राम ने उसे वापस बुलाने के लिये लक्ष्मण को भेजा। 'तब लछिमन समझावा रघुपति करुऩासींव भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव'.लक्ष्मण शेषावतार के रूप में महाकाल हैं। अब किसी को बिस्तर पर यदि सर्प बैठा दिखाई दे तो वह घर छोड़ कहीं भी भाग सकता है, परंतु भय के ऱूप में जो दुख है उसका सर्वाधिक सदुपयोग यह है कि उन क्षणों में परमेश्वर याद आये। कामकाज में लगे सुग्रीव को रामकाज की याद आ गयी।
   
दुख के क्षणों का सदुपयोग  लंका में अशोकवाटिका में बैठी सीता कर रही हैं। श्री राम ने लंका से वापस लौटे हनुमान से पूछा 'कहहु तात केहि भांति जानकी रहति करति रक्षा स्वप्रान की'. हनुमान जी ने उत्तर दिया 'नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट लोचन निज पद जंत्रित प्रान जाहिं केहि वाट'.दिनरात नामजप का पहरा लगा हुआ है और ध्यान का किवाड़ बंद कर नेत्रों को अपने पैरों की ओर ही केंद्रित कर दिया है जिससे प्राण निकल नहीं पा रहे हैं। श्री राम ने चिंता व्यक्त की कि मनसा वाचा कर्मणा मेरे प्रति समर्पित होने के बाद भी सीता कितनी दुखी हैं? तो हनुमान जी ने उन्हे दुख की सच्ची परिभाषा बता दी 'कह हनुमंत विपति प्रभु सोई जब तव सुमिरन भजन न होई'. प्रभु आपके वियोगजन्य दुख ने सीता को आपके भजन में लीन होने का अवसर प्रदान कर दिया जिससे वे दुखानंद की अनुभूति में डूबी हुई हैं।
   कबीर ने  दुख की महिमा गायी 'दुख वह सुख की खान है साहब आवें याद वही घरी बस घरी है बाकी सब बरबाद'. वे कहते हैं सुख की स्थितियां बेकार हैं उनसे कोई फायदा नहीं वल्कि दुख की स्थितियां बड़ी सुखदायक हैं 'सुख के माथे सिल परै जो नाम हृदय से जाय बलिहारी वा दुख की जो रामहि राम रटाय' दुख के क्षणों की विशेषता है कि दुखी व्यक्ति से पाप की संभावना नहीं जबकि सुखी व्यक्ति के जीवन में पाप की संभावना बनी रहती है। पाप हमेशा हंसते हुए होता है रोते हुए व्यक्ति से पाप नहीं होता। कबीर ने कहा 'हंसि हंसि कंता न मिला जिन पाया तिन रोय जौ हंसि हंसि कंता मिलै काहे दुहागिनि होय' 

वीर विक्रम बहादुर मिश्र 

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

अपना इकबाल खोती योगी सरकार

   

आईपी सिंह, वरिष्ठ भाजपा नेता, यूपी
  प्रचंड बहुमत की सरकार है लेकिन जनता नदारद है--- -सत्ता के गलियारे की चमक,कालिदास मार्ग जिसपर मा0 मुख्यमंत्री जी का सरकारी आवास है। यह इलाका दशकों से अपनी चमक बिखेरता रहा है। सनद रहे कि CM आवास के साथ वरिष्ठ मंत्रियों के ज्यादातर आवास इसी मार्ग पर है साथ में विक्रमादित्य मार्ग भी चर्चा का केंद्र रहा है। उसी के साथ माल-एवेन्यू में भी मंत्रियों के निवास स्थल है। यहाँ कई पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास है। किसी भी सरकार के काम-काज का आकलन यहाँ से शुरू होकर विधानसभा, एनेक्सी,आज का आधुनिक लोकभवन पर समाप्त होता है। और पार्टी मुख्यालय आम कार्यकर्ता के लिए जुटने का और जब सरकार रहती है तो सत्ता का बड़ा केंद्र रहता है। दो दशक पूर्व जब मन्त्रियों के आवासों पर गहमागहमी दिनरात देखी जाती थी। प्रदेशभर से जनताअपने विभिन्न कार्यो को लेकर विधायकों के साथ आवा-जाही उनकी बनी रहती थी। सुबह 2 जनता मंत्रियों के आवास पर धमक जाती थी। और मिलने का सिलसिला 11 बजे दिन तक चलता रहता था।   
    ततपश्चात मंत्रियों के कारों का काफिला एक एक कर विधान सभा में प्रवेश करता था। और दिनभर अफसरों के साथ मीटिंग, समीक्षा आदि चलती रहती थी। चूंकि समयाभाव के कारण बहुत से मंत्रियों का दिन का भोजन उनके घर से अक्सर दफ्तर में आ जाता था। 
   अपने काम के प्रति एक जुनून स्वयं हमने अपनी आँखों से देखा है। और जैसे ही दिन के तीन बजते थे। आम जनता मंत्रियों के चेम्बर में धमक जाती थी,और सबकी सुनवाई होती थी। एक वाकया मुझे याद है मा0 कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। श्री रविन्द्र शुक्ला जी शिक्षा मंत्री थे। एक कार्यक्रम के सिलसिले में मैं उनसे मिलने विधानसभा में उनके कक्ष में पहुँचा तो देखा आपका चेम्बर खचाखच भरा हुआ था।और वे स्वयं उठकर सबसे प्रार्थना पत्र ले रहे थे। क्योंकि तब कार्य संस्कृति टालने की नही थी। मंत्रियों अफसरों में भय रहता था कि यदि काम नही करूँगा तो मेरी कुर्सी चली जायेगी। बिना रोकटोक के कार्यकर्ता छोड़िए आम जनता मंत्रियों से भेंट कर लेती थी। मेरा मानना है कि "सरकार इकबाल से चलती है"।
     तब मंत्रियों से मिलने का समय निर्धारित होता था। सप्ताह में सोमवार के लेकर शुक्रवार की शाम तक मंत्री जमकर सरकारी आवास से लेकर विधानसभा तक अपना विभागीय कार्य करते थे। शनिवार और रविवार अपने निर्धारित कार्य से प्रदेश का दौरा या अपने 2 क्षेत्र चले जाते थे। मंत्रियों के लिए अपने आफिस में बैठना और सरकारी कार्य करना अनिवार्य होता था। वक्त बदला और उसी के साथ सब कुछ बदल गया।
      मित्रों अब वो दौर भी चला गया। जब फोटो खींचने के लिए कैमरे की जरूरत पड़ती थी और कैमरा सब जगह ले जाना भी मना था। आजका दौर पहले से बहुत बेहतर है। हर हाथ में मोबाइल और उसमें कैमरा लगा है। 
    अपने खुले कैमरे के साथ सबसे पहले चीर परिचित स्थान कालिदास मार्ग पर ले चलता हूँ। जाइये और देखिए कितने मंत्री अपने आवास पर मौजूद हैं क्या उनकी लोकप्रियता के कारण उनके घर के बाहर कार्यकर्ता या या जनता मौजूद है आप सब जगह निरीक्षण करिये जहाँ 2 मंत्रियों के निवास है आपको ज्यादातर सन्नाटा मिलेगा। हाँ सुरक्षा में तैनात गारद और गिने चुने मंत्रियों के करीबी लोग मिल सकते है। उससे ज्यादा कुछ नही,जनता के लिए विधानसभा के अंदर प्रवेश पर बहुत सख्ती है लेकिन जो दलाल किस्म के लोग है चाहे जिसकी सरकार हो उनका प्रवेश धड़ल्ले से होता है पास उन्ही का बनता है जिसे मंत्री का स्टाफ पर्ची भेजेगा वो भी सीमित फिर जनता मंत्री से कैसे मिल सकती है । अब दिन में 3 बजे के बाद कोई मंत्री जनता से मिलने के लिए नही बैठता है।           दो माह पूर्व दिल्ली से कुछ वरिष्ठ पत्रकार आये थे। उन लोगों ने कहाँ यदि कुछ मंत्रियों से हम लोगों की भेंट हो जाती तो यूपी के विकास पर एक रिपोर्ट बना ली जाती, मित्रों मैं उन लोगों के साथ विधानसभा के दोनों भवनों में मंत्रीगण से मिलने के लिए घूमता रहा। वो पूरा वीरान पड़ा था। वहां कोई भी मंत्री मौजूद नही था। उनके दफ्तर जरूर खुले थे। लेकिन कोई काम काज नही हो रहा था।जानकारी किया तो पता चला कि विधानसभा अध्यक्ष जी आये है हम सब ऊपरी फ्लोर पर पहुँचे तो मा0 विधानसभा अध्यक्ष जी से हम लोगों की 10 मिनट की भेंट हुई।  मैं मानसिक रूप से संतुष्ट हुआ कि चलो किसी से तो भेंट हुई। आजके दौर में मंत्री फाइले अपने घर पर करते है। दो साल होने को है और दो मंत्री रेगुलर अपने सरकारी दफ्तर में नही बैठते है। ज्यादातर मंत्री अक्सर दौरे पर रहते है और उनके दौरे विभागीय होते है या राजनैतिक, या व्यक्तिगत किसी को नही पता,उसकी जानकारी सार्वजनिक नही होती। विधानसभा में यदि मंत्रियों की अफसरों की biometric व्यवस्था कर दी जाय और उसकी रिपोर्ट प्रकाशित हो तो तहलका मच जायेगा। क्योंकि मान्यवर लोग दफ़्तर नही आते है,मीटिंग घर पर करते है फिर लाख टके का एक सवाल--
    सरकार अफसरों से कैसे उम्मीद कर सकती है कि वे अपने दफ्तर में बैठकर देर रात तक काम करेंगे। यकिन मानिये बिश्वास कीजिये। आज सब कुछ पटरी से उतर चुका है। भाजपा सरकार से जनता को बड़ी उम्मीदें थीं क्या हमारे मंत्रीगण विधायक,अफसर उसपर 100 प्रतिशत खरे उतरे रहे है। मंत्रियों में जो लाज और भय रहना चाहिए वो बिल्कुल खत्म हो गया है। यदि किसी सरकार का कार्य देखना है तो तेलंगाना,आन्ध्र प्रदेश का कार्य संस्कृति अवश्य देखना चाहिए। आपकी आँखे खुली की खुली रह जायेगी। सरकार बनने के बाद नेतागिरी से काम नही होगा। काम बैठकर करना होगा तक कार्य पूरे होंगे तब जाकर जनता और प्रदेश को सरकार का काम दिखाई देगा।
             सत्यमेव जयते 

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

नोटा के सोंटा से तिलमिला उठी है भाजपा

सुशील अवस्थी "राजन"
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस को बहुमत न मिलने के पीछे नोटा को मुख्य वजह माना जा रहा है। कम से कम 14 सीटें ऐसी हैं जहां नोटा यानी ‘नन ऑफ द अबव’ दोनों दलों के लिए विलेन साबित हुआ है। 230 सीटों में से 14 सीटों पर हार का अंतर नोटा में पड़े वोट से भी कम था। इससे पहले कर्नाटक चुनावों में भी नोटा ने 8 सीटों पर भाजपा की जीत को हार में तब्दील कर दिया था। चुनाव आयोग के आंकड़ों पर नजर डालें तो मध्यप्रदेश में बहुमत का समीकरण नोटा के चलते बिगड़ा है।
मध्यप्रदेश चुनावों में डेढ़ फीसदी (4,666,26) वोटरों ने नोटा पर बटन दबाया था। राजनीतिक विश्लेषक इस परिस्थिति के लिए दोनों दलों के बूथ मैनेजमेंट को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर दोनों दलों ने मतदाताओं को विश्वास जीता होता तो, इतनी संख्या में नोटा के वोट नहीं पड़ते। उनका कहना है कि जिस तरह से भाजपा और कांग्रेस बराबरी पर हैं, इससे साफ हो गया है कि इस बार का चुनाव पूरी तरह से नोटा के शिकंजे में रहा है।
मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों को 41.2 प्रतिशत वोट मिले हैं। आंकड़ों पर नजर डालें, तो मध्यप्रदेश की वारासिवनी सीट पर निर्दलीय प्रदीप जायसवाल को 45612 वोट मिले, जबकि भाजपा के योगेश निर्मल को 44663 वोच मिले। वहीं नोटा में 1045 वोट पड़े। वहीं टीकमगढ़ में कांग्रेस प्रत्याशी को 44384 और भाजपा को 44573 और नोटा को 986 वोट पड़े। सुवासरा विधानसभा में भाजपा को 89712 और कांग्रेस को 89364 और नोटा पर 2874 वोट पड़े। गरोथ में भाजपा को 72219 और कांग्रेस को 69953, वहीं नोटा को 2351 वोट मिले।
राजनगर विधानसभा सीट की बात करें, तों यहां भाजपा के उम्मीदवार को 34807 वोट और कांग्रेस के प्रत्याशी को 34139 वोट पड़े, जबकि नोटा के पक्ष में 2133 वोट पड़े। नेपानगर में कांग्रेस को 85320, भाजपा को 84056 और नोटा को 2551 वोट पड़े। मान्धाता में कांग्रेस को 71228, भाजपा को 69992 और नोटा को 1575 वोट पड़े। कोलारस में भाजपा को 71173 और कांग्रेस को 70941, जबकि नोटा पर 1649 वोट पड़े। जोबाट सीट पर नोटा में 5139 वोट पड़े, जबकि दोनों दलों के प्रत्याशियों की जीत का अंतर 2500 सौ वोटों का रहा। जओरा सीट पर नोटा के पक्ष में 1500 वोट पड़े, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी को जीत के लिए मात्र 700 वोट चाहिए थे।
वहीं पन्ना जिले के गुनौर विधानसभा में नोटा पर 3734 वोट पड़े, जबकि कांग्रेस को 57657 और भाजपा को 55674 वोट पड़े। वहीं यूपी की सीमा से लगने वाले चंदला में नोटा के पक्ष में 2695 वोट पड़े, जबकि जीत का अंतर 1100 वोटों से भी कम रहा। वहीं बीना विधानसभा में नोटा पर 1528 वोट गिरे, जबकि जीत का अंतर 600 वोटों से कम रहा। वहीं ब्यावरा में नोटा पर 1481 वोट गिरे, जबकि कांग्रेस को 75569 और भाजपा को 74743 वोट मिले।
भैंसदेही में सबसे ज्यादा 7706 वोट नोटा में पड़े और तकरीबन 13 से ज्यादा विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे, जहां पांच हजार से ज्यादा वोट नोटा के पक्ष में गिरे। वहीं मध्यप्रदेश में तीसरी ताकत बनने वाली आम आदमी पार्टी को नोटा से करारा झटका लगा है। नोटा को मिले वोटटा प्रतिशत आप को मिले वोटों से कहीं ज्यादा है। आप को 0.7 प्रतिशत के साथ देर शाम तक 2,408,79 वोट हासिल हुए हैं।

गुरुवार, 28 जून 2018

श्रमजीवी पत्रकार की जेल गाथा: के.विश्वदेव


उन दिनों (1976-77) दिल्ली की तिहाड़ जेल के वार्ड सत्रह में पिताजी के विक्रम राव (K Vikram Rao) नजरबन्द थें, जार्ज फर्नांडिस (George Fernandes) तथा 23 अन्य के साथ। सी.बी.आई. (#CBI) की चार्जशीट में लगी धाराओं के अनुसार उन्हें सजाये-मौत देने की मांग की गई थी। यह मेरे जन्म (22 मार्च 1978) के चन्द महीनों पहले का वृत्तान्त हैं। अपने अग्रज सुदेव और दीदी विनीता तथा माँ डा० सुधा से विवरण सुनता आया था। बड़ौदा डाइनामाईट केस (#BarodaDynamiteCase) के सभी अभियुक्तों का पुलिसिया आकलन में इन्दिरा गाँधी (Indira Gandhi) के सर्वाधिक खतरनाक शत्रुओं में शुमार था। हालांकि तमाम सच्चे झूठे प्रयासों के बावजूद सी.बी.आई. कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई थी कि इन विद्रोहियों ने किसी प्रकार की प्राण-हानि पहुँचाई हो। प्रारंभ में बड़ौदा सेन्ट्रल जेल में पिताजी के साथ पाँच कैदी थे जिन्हें तन्हा कोठरी में बेड़ियों के साथ दो ताले लगाकर बन्द किया जाता था। इन अठारह वर्ग फिटवाली कोठरियों का निर्माण महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने 1876 में फांसी के सजायाफ्ता अपराधियों के लिए किया था। कुछ महीनों बाद इन कैदियों को बड़ौदा से दिल्ली के तिहाड़ जेल में ले जाया गया। वहाँ नौ राज्यों में गिरफ्तार किये गये डायनामाइट केस के अन्य अभियुक्तों को भी एक साथ रखा गया था।
 एक साहसी संवाददाता के नाते पिताजी ने अभिव्यक्ति की आज़ादी  के दमन के विरूद्ध अभियान चलाया था। इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ - Indian Federation of Working Journalists) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (पुणे सम्मेलन, 1973 में) वे चुने गये थे। अतः प्रेस सेंसरशिप (25 जून 1975) लागू होते ही संघर्ष शुरू कर दिया था। फेडरेशन की राष्ट्रीय परिषद के बंगलूर अधिवेशन (फरवरी 1976) में इन्दिरा गाँधी शासन की तानाशाही की भर्त्सना वाला प्रस्ताव उन्होंने बहुमत से पारित कराया। इसके चन्द दिनों बाद ही (19 मार्च 1976) गुजरात पुलिस ने पिताजी को कैद कर लिया। और तभी अखबारी आज़ादी के अनन्य समर्थक टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रधान संपादक शाम लाल तथा सम्पादक गिरिलाल जैन ने बड़ौदा जेल में पिताजी के निलम्बन का आदेश (अप्रैल 1976) और फिर दिल्ली जेल में (अक्टूबर 1976) बरखास्तगी का आदेश भिजवा दिया। इतनी त्वरित गति से काम किया कि सत्ता पर सवार लोग प्रभावित हो गये थें। इस बीच हमारे परिवार पर क्या गुजरी यह दर्दभरी दास्तां है। मेरी माँ (डा० सुधा) का बड़ौदा मंडलीय रेलवे अस्पताल से पाकिस्तान के सीमावर्ती गाँधीधाम (कच्छ) रेगिस्तानी इलाके में तबादला कर दिया गया। वे राजपत्रित रेल अधिकारी थीं। परिवार बिखर गया। पिताजी ने जेल से ही स्वाधीनता सेनानी और संपादक रहे रेलमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी को विरोध-पत्र लिखा कि अंग्रेजों ने भी कभी किसी स्वाधीनता सेनानी के परिवार को तंग नहीं किया, तो फिर कांग्रेस सरकार की ऐसी अमानवीय नीति क्यों?  
   आखिर स्वयं त्रिपाठी जी तथा मेरे दादाजी (नेहरू के नेशनल हेरल्ड के संस्थापक-सम्पादक) स्व. के. रामा राव भी (1942) में जेल गये थें। उनके परिवार को ब्रिटिश राज ने कभी परेशान नहीं किया था। इस पर रेल मंत्री ने दिल्ली के एक पत्रकार-प्रतिनिधि मंडल से कहा कि वे असहाय थे। “ऊपर से आदेश आया था”। इतना सब होने के कुछ दिन पूर्व ही अचानक बड़ौदा के समाचारपत्रों में खबर छपी कि कर्नाटक पुलिस और सी.बी.आई पिताजी को सान्ताक्रूज (मुम्बई) थाने में, फिर बंगलूर पुलिस की हिरासत में ले गई हैं। माँ ने सी.बी.आई. अद्दिकारियों से विरोध व्यक्त किया कि बिना परिवार को सूचित किये बड़ौदा जेल के बाहर पिताजी को कैसे ले गये?  इस पर पुलिस का जवाब था, “सर्वोच्च न्यायालय के प्रद्दान न्यायमूर्ति ए.एन. राय के निर्णय के अनुसार इमर्जेंसी में सरकार को किसी भी नागरिक की जान लेने का भी अद्दिकार है। इसके खिलाफ कहीं भी सुनवाई नहीं हो सकती है”। बंगलूर (मल्लीश्वरम्) पुलिस हिरासत में ठण्डी फर्श पर सुलाना, बिना कुर्सी दिये घंटों खड़ा रख कर सवाल जवाब करना, रात को तेज रोशनी चेहरे पर डालकर जगाये रखना, इसपर भी कुछ न बताने पर हेलिकाप्टर (पंखे से लटकाना) बनाना आदि यातनायें दीं गईं। 
   बडौदा के मुख्य दण्डाधिकारी और जिला जज ने  जमानत की याचिका खारिज कर दी। बाद में पिताजी की अपील सुनकर गुजरात हाई कोर्ट ने जमानत पर रिहाई का आदेश दे दिया। तभी इन्दिरा गाँद्दी सरकार ने उन पर मीसा (आन्तरिक सुरक्षा कानून) के तहत नजरबन्दी का आदेश लागू कर दिया। तब तक कानून था कि यदि पुलिस साठ दिन में चार्जशीट नहीं दायर कर सकी तो जमानत अपने आप मिल जाती थी। इस प्रावधान को भारत सरकार ने संशोधित कर एक सौ बीस दिन कर दिया। इसके अलावा यह भी कानून बना दिया गया कि पुलिस के समक्ष दिया गया बयान भी सबूत माना जायेगा। अर्थात जबरन लिया गया वक्तव्य भी वैध बना दिया गया जो गुलाम भारत में भी नहीं था। जब जमानत  मिलने पर भी जेल के अन्दर ही पिताजी को दुबारा गिरफ्तार कर दिल्ली रवाना कर दिया गया तो ये सारे अमानविक तथा अवैध संशोधन अपनी तीव्रता खो चुके थे। तब एक चुटकुला चल निकला था कि मीसा के मायने हैं मेइंटिनेन्स ऑफ इन्दिरा एण्ड संजय (इन्टर्नल सेक्युरिटि) एक्ट है। अन्याय की पराकाष्ठा तो तब हुई जब पिताजी के वकील को भी जेल में निरूद्ध कर दिया गया था। 
     बड़ौदा जेल में पिताजी के साथ यादगार घटनायें हुई। माओ जेडोंग का निधन (9 सितम्बर 1976) हो गया था तो पिताजी ने अपने वार्ड में शोकसभा रखी। सभी कैदी शामिल हुए जिससे श्री बाबूभाई जशभाई पटेल, जो 1977 में जनता पार्टी के मुख्य मंत्री बने, जनसंघ विधायक चिमनभाई शुक्ल जो राजकोट से लोकसभा में आयें, सर्वोदयी प्रभुदास पटवारी जो 1977 में तमिलनाडु के राज्यपाल नियुक्त हुए, आदि ने संबोधित किया। सबने वन्दे मातरम भी गाया तो संगठन कांग्रेसियों ने केवल पहला छन्द ही गाया क्योंकि अगले में मूर्तिपूजा का भास था, जिस पर कुछ मुसलमान आपत्ति करते आये हैं। इस पर जनसंघ विधायक चिमनभाई शुक्ल ने आलोचना की कि इन कांग्रेसियों ने पहले भारत को बांटा और अब वन्दे मातरम को भी काट रहें हैं। बड़ौदा जेल में पिताजी को भोजन की कठिनाई तो होती थी क्योंकि वे प्याज-लहसुन तक का परहेज करते हैं। नाश्ते में उन्हें गुड़ और भुना चना मिलता था जिसे वे चींटियों और चिड़ियों को खिला देते थें। लेकिन सबसे कष्टदायक बात थी कि पत्रकार को समाचारपत्र नही मिलते थे। पिताजी की दशा बिन पानी की मछली जैसी थी। मगर यह दुःख शीघ्र दूर हो गया जब एक युवक पिताजी के लिए रोज अखबारों का बण्डल पहुँचाता था जिसे तरस खाकर जेलर साहब पिताजी के बैरक में पहुँचा देते थे। वह युवक था नरेन्द्र दामोदरदास मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री एव अब भारत के प्रधानमंत्री। 
 उनकी कैद के प्रथम दिन से ही पिताजी की प्रतिरोधात्मक संकल्प शक्ति को तोड़ने की साजिश सी.बी.आई. रचती रही थी। आला पुलिस हाकिमों ने केन्द्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर पिताजी को जार्ज फर्नांडिस के विरूद्ध वादामाफ गवाह (एप्रूवर) बनाने का सतत यत्न किया था। एक दिन तो उनलोगों ने पिताजी को अल्टिमेटम दे डाला कि यदि वे सरकारी गवाह नही बनेंगे तो उनकी पत्नी (मेरी माँ) को भी सहअपराधी बनाकर बड़ौदा जेल में ले आयेंगे। पिताजी ने बाद में हम सबको बताया कि सी.बी.आई. की धमकी से वे हिल गये थे। तब मेरी बहन विनीता चार वर्ष की और भाई सुदेव तीन वर्ष के थे। दूसरे शनिवार को माँ बड़ौदा जेल भेंट करने आईं। उनसे पिताजी ने पूछा। माँ ने बेहिचक कहा कि “जेल में खाना पकाऊँगी। यहीं रहेंगे। पर साथी (जार्ज फर्नांडिस) से गद्दारी नही करेंगे”। अगले दिन सी.बी.आई वाले जानने आये। पिताजी का जवाब तीन ही शब्दों में था, “लड़ेंगे, झुकेंगे नहीं”। फिर यातनाओं का सिलसिला ज्यादा लम्बाया।
   कैदी के रूप में पिताजी तथा उनके साथियों से बड़े अपमानजनक तरीके से बर्ताव किया जाता था, खासकर जब उन्हें अदालत ले जाया जाता था। हथकड़ी और मोटी रस्सी से बांध कर आठ-आठ सिपाही लोग बख्तरबन्द गाड़ी में जेल से कोर्ट और वापस जेल ले जाते थें। सैकड़ों सशस्त्र पुलिसवाले उनकी गाड़ी के आगे पीछे चलते थें। पिताजी की कलाई के साथ स्व. वीरेन जे. शाह को भी बांधा जाता था। इस पर पिताजी ने व्यंग किया कि इन्दिरा गाँधी ने असली समाजवाद ला दिया है। श्री वीरेन शाह अरबपति, उद्योपति (मकुन्द आयरन एण्ड स्टील के मालिक), भारतीय जनसंघ के सांसद और बाद में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बने। अर्थात श्रमजीवी पत्रकार मेरे पिता तथा पूंजीपति शाह का संग! सी.बी.आई. ने जब तीस हजारी कोर्ट (दिल्ली) के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मोहम्मद शमीम (बाद में दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति तथा अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष) के सामने अभियुक्तों को पेश किया तो जार्ज फर्नांडिस ने एक लिखित बयान पढ़ा। उसमें एक वाक्य था, “हम सब लोगों की कलाइयों पर बंधी ये हथकड़ियाँ वस्तुतः भारत राष्ट्र पर लगी जंजीरें है”। 
   ठीक उसी वक्त पिताजी और अन्य ने बाहें उठा हथकड़ियाँ झनझनायी। इसे बी.बी.सी. के संवाददाता मार्क टल्ली ने विस्तार से प्रसारित किया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों का दस्ता कोर्ट आकर उनका “लाल सलाम” के नारे से अभिवादन करता था। तीस हजारी कोर्ट में अभियुक्तों से भेंट करने आने वालों में मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेई, मधु लिमये, राजनारायण, चन्द्रशेखर, भाकपा के ज्योतिर्मय बसु आदि थे। उसी दौर में बडौदा डायनामाइट केस के अभियुक्क्तों के बचाव में एक सलाहकार समिति गठित हुई थी। इसके अध्यक्ष थे वयोवृद्ध गाँधीवादी अस्सी-वर्षीय आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी। चन्द्रभानु गुप्त  कोषाध्यक्ष थे। अन्य सदस्य थे न्यायमूर्ति वी.एम. तारकुण्डे, सोली सोराबजी, अषोक देसाई आदि लब्द्दप्रतिष्ठित विद्दि विषेषज्ञ। अचानक एक रात (18 जनवरी 1977) आकाशवाणी पर प्रधानमंत्री की घोषणा हुई कि मार्च में छठी लोकसभा का चुनाव आयोजित होगा। मीसा बन्दी सब रिहा हो गये। मगर डायनामाइट केस के सभी 25 अभियुक्त जेल में ही रहे। पिताजी बताते हैं कि तिहाड़ जेल में कैद जनसंघ के सुंदर सिंह भण्डारी (बाद में बिहार और गुजरात के राज्यपाल) ने बताया था कि ये सारे मीसाबन्दी रिटर्न टिकट लेकर जेल के बाहर जा रहें हैं। चुनाव के बाद वे सब फिर कैद कर लिये जायेंगे। भण्डारी जी का कथन था कि “डायनामाइट केस के आप कैदी तो तभी रिहा हांगे जब इन्दिरा गाँधी खुद चुनाव हार जायें”। 
   मार्च के प्रथम सप्ताह (9 मार्च, मेरे दादाजी की सोलहवीं पुण्यतिथि पर) मेरी माँ दोनों बच्चों (मेरी पाँच-वर्षीया दीदी और चार-वर्षीय भाई) के साथ पिताजी से भेंट करने गाँधीधाम से दिल्ली तिहाड़ जेल गईं। रूंधे गले से माँ ने पिताजी को बताया कि शायद यह आखिरी मुलाकात है क्योंकि इन्दिरा गाँधी चुनाव जीत रहीं है और फिर जार्ज फर्नांडिस तथा पिताजी को फाँसी हो जाएगी। ये दोनों व्यक्ति नम्बर एक और दो पर नामित अभियुक्त थे। पिताजी हंसे और बोले कि कांग्रेस को सूपड़ा हिन्दी भाषी प्रदेशों में साफ हो रहा है। राज नारायण जी (Raj Narain) रायबरेली से जीतने जा रहे हैं। जनता पार्टी की सरकार बनेगी। जेल के भीतर पिताजी को लोकमानस की सही सूचना थी बजाय बाहर रहकर माँ को। फिर चुनाव परिणाम आयें। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। उनकी काबीना का प्रथम निर्णय था कि बड़ौदा डायनामाइट केस वापस ले लिया जाय। इसमें गृहमंत्री चरण सिंह, वित्त मंत्री एच.एम. पटेल, कानून मंत्री शांति भूषण तथा विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अहम भूमिका थी। केस वापस हुआ और जार्ज फर्नांडिस ने मंत्री पद की शपथ ली। सभी लोग (22 मार्च 1977 को) तिहाड़ जेल से रिहा कर दिये गये। 
 मगर किस्सा अभी बाकी था। कांग्रेस पार्टी के सांसदों और वकीलों ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की कि मोरारजी देसाई काबीना का निर्णय अवैध करार दिया जाय और सार्वजनिक एवं राष्ट्रहित में डायनामाईट केस फिर चलाया जाय। हाईकोर्ट द्वारा इसे खारिज कर देने पर इन कांग्रेसी वकीलों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दर्ज की। न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर तथा न्यायमूर्ति चेन्नप्पा रेड्डि की खण्ड पीठ ने सुनवाई की। बचाव के वकील थे जनता पार्टी के सांसद और वकील राम जेठमलानी। उनका तर्क था कि यदि इन्दिरा गाँधी, जो तब तक सत्ता पर लौट आई थीं, चाहें तो मुकदमा स्वयं खुलवा सकती हैं। अतः सर्वोच्च न्यायालय क्यों हस्तक्षेप करें ?  जजों की पीठ ने कांग्रेसी अपील खारिज कर दी। इमर्जेंसी की भूल के लिए जनता से बारम्बार क्षमा याचना करने वाली इन्दिरा गाँधी दुबारा हिम्मत नहीं जुटा सकी कि डायनामाइट केस खोल दें। अन्ततः पिताजी और सभी साथी मुक्त रहे। 
     फिर टाइम्स ऑफ इण्डिया प्रबंधन ने पिताजी को लखनऊ ब्यूरों प्रमुख बनाकर (फरवरी, 1978, मेरे जन्म के एक माह पूर्व) नियुक्त किया। मगर इसमें भी मोरारजी देसाई को हस्तक्षेप करना पड़ा। जनता पार्टी काबीना का महत्वपूर्ण निर्णय था कि जो भी लोग इमर्जेंसी का विरोध करने पर बर्खास्त हुये हैं उन्हें बकाया वेतन के साथ पुनर्नियुक्त कर दिया जाय। प्रद्दानमंत्री ने टाइम्स ऑफ इण्डिया के चेयरमैन अशोक जैन को खुद आदेश दिया कि काबीना के इस निर्णय के तहत पिताजी को सवेतन वापस लिया जाय। अतः टाइम्स ऑफ इण्डिया जो आम तौर पर भारत के श्रम कानून की खिल्ली उड़ाता रहता है, को मानना पड़ा। वह केन्द्रीय सरकार के निर्णय की अवहेलना करने से सहमा। और तब पिताजी लखनऊ में संवाददाता के रूप में कार्यरत हो गये। हमारें परिवार की यह गाथा है। आपके लिये प्रस्तुत है।

के विश्वदेव राव
ईमेल: vishwadevrao@gmail.com
मो०: 9415010300

शनिवार, 9 जून 2018

जानिए एसएन शुक्ला ने कैसे खाली कराये माया, अखिलेश मुलायम, राजनाथ, और कल्याण से सरकारी बंगले

क्या भारत की किसी सरकार में ये ताकत थी कि वो जनता के अरबों रुपये खर्च करके बनवाये गये मायावती और अखिलेश यादव के बंगलों को खाली करवा पाती? कभी नहीं। क्योंकि मायावती ने तो जीवन भर सिर्फ बंगलों की ही राजनीति की है। यूपीए सरकार को समर्थन करने के बदले में तीन बंगले ले लिये थे। 

भला हो एसएन शुक्ल जी का, जिन्होंने १४ साल की लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर जनधन का दुरुपयोग करनेवालों को बता दिया कि कोई कानून से ऊपर कोई नहीं है। अगर माननीय कानून का दुरुपयोग करेंगे तो उन्हें भी चुनौती दी जा सकती है। 

एक रिटायर्ड आईएसएस रहे एस एन शुक्ला ने अपनी संस्था लोक प्रहरी के माध्यम से अब तक दो केस जीते हैं और दोनों ही लोकतंत्र में लोक की रक्षा के सबसे अहम हथियार साबित हुए है। पहला, सजायाफ्ता अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक और दूसरा अब एक्स सीएम को सरकारी बंगला देने पर रोक। 

ऐसे ही लोग लोकतंत्र की जान और शान है। जो सुविधाभोगी भेड़ियों से न सिर्फ जन धन और सम्मान की रक्षा करते हैं बल्कि उन्हें सबक भी सिखाते हैं, जो कि लोकतंत्र का दुरुपयोग अपने निजी फायदे के लिए ही करते हैं।

योगी का एक मंत्री.. जिसे निपटाने के लिए रचा गया बड़ा षडयंत्र हुआ नाकाम

  सुशील अवस्थी 'राजन' चित्र में एक पेशेंट है जिसे एक सज्जन कुछ पिला रहे हैं। दरसल ये चित्र आगरा के एक निजी अस्पताल का है। पेशेंट है ...